मंगळवार, ऑक्टोबंर 22, 2019
   
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भारता ऊठ!

ऊठ ऊठ, भारता! तू ऊठ उज्वला!
अभिनवबलवैभवयुत शोभ मंगला।।
दशदिशांत कीर्तिगंध मधुर दरवळो
त्वत्पावन-नामबळे दुरित ते पळो
धैर्य तुझे शौर्य तुझे अमित ना ढळो
जीर्ण शीर्ण सकळ आज जे तुझे गळो
दास्ये ना फिरुन कधी मुख तुझे मळो
शांता, दाता, कांता
रुचिर थोर कृति कर तू सतत निर्मळा।। ऊठ....।।

-त्रिचनापल्ली तुरुंग, ऑगस्ट १९३०

वंदे मातरम्!


वंदे मातरम् वंदे मातरम्
वंदे मातरम् वंदे मातरम्।।

तव गतवैभव पुनरपि मिळवू
तव सत्कीर्ति न पुनरपि मळवू
उज्वल करु तव वदन त्रिभुवनि
करु कष्ट तुझ्यासाठी निशिदिनी
वंदे मातरम् वंदे मातरम्
वंदे मातरम् वंदे मातरम्।।

तुज पुनरपि जननी गे हसवू
तुज राष्ट्रांच्या शीर्षी बसवू
सकळ जगाची होशिल माता
देलि हतपतिता तू हाता
वंदे मातरम् वंदे मातरम्
वंदे मातरम् वंदे मातरम्।।

अश्रु न आई! आता ढाळी
आइ! नआता पाही खाली
त्वत्सुत आम्ही पराक्रमाने
मिरवू तुज जगि सन्मानाने
वंदे मातरम् वंदे मातरम्
वंदे मातरम् वंदे मातरम्।।

ऊठ, पहा आम्हि सारे भाई
एक जाहलो द्रोह न राही
घसरु पुढती मिळवू विजया
दास्य झणी तव नेऊ विलया
वंदे मातरम् वंदे मातरम्
वंदे मातरम् वंदे मातरम्।।

विद्यावैभवविकास येइल
तववदनांबुज, आइ! फुलेल
तुज भाग्यगिरीवरि बघ नेऊ
त्वच्चरणी रत सतत राहू
वंदे मातरम् वंदे मातरम्
वंदे मातरम् वंदे मातरम्।।

-त्रिचनापल्ली तुरुंग, ऑक्टोबर १९३०

पत्री