बुधवार, जुन 19, 2019
   
Text Size

(गाणे)
प्रियकर भारत, गुणमणि भारत, स्वातंत्र्या पावो
सकल विकलता
विलया जाउन
निजतेजा लाहो।। प्रियकर....।।

संहारुन संसार-विषमता
निर्मुन धरणीवरती समता
शातिपथा दावो।। प्रियकर....।।

मोहमलिनता दुरभिमानता
असुर-समरता सत्ता-रसता
जगतातुन जावो।। प्रियकर....।।

मनुज-दिव्यता विश्वबंधुता
उदया येवो मरुनी पशुता
वरति जगा नेवि।। प्रियकर....।।

धर्म सकल होवोत उदार
हंसासम जन निवडो सार
स्नेह विपुल होवो।। प्रियकर....।।

करुनि निजांतर-तिमिर-निरास
करुन घेउ दे जगा विकास
प्रतिबंध न राहो।। प्रियकर....।।

उत्साहाचा आनंदाचा
सहृदयतेचा जगदैक्याचा
पवन मधुर वाहो।। प्रियकर....।।

ज्ञानहि वाढो आदर वाढो
श्रद्धा वाढो सदगुण वाढो
परमात्मा येवो।। प्रियकर....।।

उत्तरोत्तर प्रकाश लाभुनी
पूर्णतेकडे डोळे लावुनी
प्रभुस मनुज पाहो।। प्रियकर....।।

(मुलगा हे दिव्य दर्शन पित्यास घडवितो व विचारतो, “बाबा, तुम्ही भारतमातेसाठी नाही का मरणार, नाही का झिजणार?” तेव्हा बाप म्हणतो,)

“बाळ मी सर्व देईन सेवा हातूव ह्या घडो
जनांची करिता सेवा मदीय देह हा पडो।।
आम्ही दोघे जीवनाते उदात्ततर रे करू
बाळा हे गुण-लावण्य संसार लीलया तरू।।
पुत्र तू आमुचा धन्य अंजना घालुनी अम्हा
दिधली दिव्य तू दृष्टी हरुनी मोहता तमा।।
प्रकाश तो पहा येतो पसरेल महिवरी
त्यापरी सत्प्रभा येते आमुच्या सुप्त अंतरी।।”

(मुलगा म्हणतो, “खरेच बाबा, प्रभातप्रभा फाकत आहे व भाग्याची प्रभाही भारतावर फाकेल; भारतमाता स्वातंत्र्याने तळपेल.”)

प्रकाश आला पहा तरी। स्वतंत्रता भारतावरी
अमरत्वाची प्रभाचशी। उषा चमकते आकाशी
सकल लोपला अंधार। सृष्टी दिसते मनोहर
पवन वाहतो
सुमगण फुलतो
परिमल भरतो
हृदयाल्हादक दिगंतरी।। प्रकाश....।।

चराचरा ह्या विश्वाला। चैतन्याची चढे कळा
निद्रातंद्रा दुरावली। जागृति सकलांतरि आली
तरु डोलती
विहंग उडती
कलरव करिती
सुरम्य मंजूळ शुभ स्वरी।। प्रकाश....।।

हरित-श्यामल-तृणावरी। नाचत किरणे सोनेरी
मोत्यांसम हे दंव दिसते। प्रकाश हृदयी साठविते
मऊ गलिचे
लावण्याचे
हे मोत्यांचे
सृष्टिदेवता ही पसरी।। प्रकाश....।।

पहा पहा तो उभा रवी। विश्वाचा तो मुका कवि
काव्य ओतितो विश्वात। श्रद्धा याची हृदयात
तेजोराशी
चराचराशी
देती आशी
आशा देतो खरीखुरी।। प्रकाश....।।

जगी लोपुनी अंधार। प्रकाश येतो बाहेर
उत्साहाचे माहेर। बना सांगतो प्रभाकर
दु:ख न राही
अभ्र न राही
प्रकाश येई
पडला उठलो पुन्हा परी।। प्रकाश....।।

प्रकाश येतो जन उठती। बंध भराभर ते तुटती
मायामोहातुन सुटती। आशेला पल्लव फुटती
वैभव येते
भाग्य हासते
तेज फाकते
विकास येइल घरोघरी।। प्रकाश....।।

दिव्य कोंदला आनंद। शुभ मंगल परमानंद
नाचति गाणी गाऊन। हाती हाता घेऊन
विद्या येते
कला शोभते
मूर्ती दिसते
प्रभूची मज भारतांतरी।। प्रकाश....।।

पत्री